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मैना और मूक – पुत्र की कहानी | motivational hindi kahani

आइए एक motivational hindi kahani पढ़ें जिससे कुछ ज्ञान की प्राप्ति हो।

बेटा हाऊँ – हाऊँ करते हुए चीखने लगा। उसकी आवाज से कटास पीछे नहीं हट रहा था। एक सोंटा लिये उसके सामने खड़े होकर जोर – जोर से हाऊँ – हाऊँ कर रहा था बेटा। पर वह बिना हटे मौके के इंतजार में था। मौका मिलते ही जैसे ही उसने मैना के ऊपर झपट्टा मारा, मैना को अपनी गोद में छिपाते हुए बेटा चीखने लगा – माँ, माँ, माँआ…।

आधी रात को गाँव के मुखिया ने भीमराज पक्षी की आवाज सुनी। कानों पर विश्वास नहीं हुआ। अच्छी तरह सुनने के लिए फिर से कान खड़े किये। हाँ, यह भीमराज पक्षी की आवाज है। अशुभ है, अशुभ। पूरे महल्ले को आवाज दी। टाट-कबाट खटखटाने लगा। उनींदी आँखों को मलते हुए सब ने दरवाजे खोले। प्रश्न भरी आँखें घिर गयीं। क्या हुआ है? गाँव में बाघ घुस आया है क्या? क्या उठा ले गया है किसी की गाय, भेड़ या बकरी को? मुखिया ने सब को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा – “सुनो, सुनो इस आवाज को।” 

रात की अँधियारी और नीरवता को चीरते हुए आने वाली आवाज की ओर सब ने कान दिया।

“सुन पा रहे हो?” 

उस समय युवावस्था के दो लोगों ने कहा – “सुन तो रहे हैं, लेकिन यह हाथी या बाघ की दहाड़ नहीं है। यह किसी एक पक्षी की आवाज है।” 

“हाँ, यह पक्षी की आवाज है।” 

इस आवाज की ओर कान देने वाले अधेड़ उम्र के लोग अन्दर ही अन्दर भयभीत हो उठे थे। उन्होंने कहा – “यह सिर्फ पक्षी की आवाज नहीं है, यह गाँव को उजाड़ने की आवाज है। अब हम क्या करें मुखिया? खेत में पके हुए धान है, पहाड़ी में मकई और अरहर है। यह सब छोड़ कर कैसे…?” 

यह तो पहरिया जाति के भाग्य की लिखावट है। खेत के धान, मकई और अरहर के लोभ में आकर क्या जान दे देंगे? जिन्दा रहेंगे तो फसल से लोभ रहेगा। जब जीवन ही नहीं रहेगा, तो?

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“अब कहाँ जाएँगे?” 

यहाँ आकर गाँव बसाते हुए कितने बरस हो गये? यहाँ आकर जब हम बसे, तब क्या चिंता की  थी इस बात की? पैर जिधर ले जाएँगे और जो जगह हमें अपनी लगेगी, वहीं बस जाएँगे। अब देर मत करो जाओ। बाँध लो अपना अपना बोरा – बिस्तर। रात गुजरने से पहले हमें यहाँ आग लगानी पड़ेगी।

सुनाबेड़ा के अभयारण्य के बीचोबीच आग लगी है। पहरियाओं ने उजाड़ दिया है गाँव को। यह खबर हमारे आफिस में पहुँची तो विचलित होकर डी. एफ.ओ. ने हम सबको बुलाया। निर्देश दिया कि तुरन्त जाकर देखो। गाँव में आग लगा दी गयी है। यानी, आग सारे अभयारण्य में फैल जाएगी। फिर किसी और जगह जाकर वे गाँव बसायेंगे। जंगल काटेंगे। यह अभयारण्य बरबाद हो जाएगा।

कुछ फॉरिस्ट गार्ड और फारिस्टरों को साथ लेकर वहाँ पहुँचने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी। वहाँ पहुँचना आसान काम नहीं था। जीप तो फारिस्ट रेस्ट शेड तक ही जा सकती है। वहाँ से दस – बारह किलोमिटर तक जंगल, झरना और पहाड़ों को पार करने के बाद ही आयेगा पहरिया पाड़ा। इसलिए बाकायदा कैम्प का इंतजाम करके हम निकल पड़े उस गाँव की ओर।

जब हम पहरिया पाड़े में पहुँचे, तब तक साँझ ढल-चुकी थी। पूरा गाँव जल चुका था। गाँव तबदील हो गया था राख के ढेरों में। हम ने राख के ढेरों को कुरेद कर देखा कि आग है या नहीं। हमारी यह खुशकिस्मती थी कि राख के ढेरों में आग नहीं थी और आग आसपास के जंगल में भी फैली नहीं थी। पहली जिम्मेदारी से छुटकारा मिलने के कारण हम लोगों ने तसल्ली की साँस ली। यह बाद में तलाशा जाएगा कि वे कहाँ गये। अभी रात को ठहरने के लिए तम्बू का इंतजाम किया।

सुबह झरना में जाकर दिनचर्या खत्म करके लौटते समय देखा कि पेड़ में डाले गये फंदे में एक चिड़िया फँसी हुई है। पेड़ पर चढ़ कर फंदे को खोला और चिड़िया को पकड़ कर देखा कि वह एक नन्ही-सी मैना है। मैं जब तम्बू के पास पहुँचा, तो एक फारिस्ट गार्ड मेरे हाथ में नन्ही मैना को देख कर कहा – “आपको यह मैना कहाँ से मिली सर्! यह तो एक विरल किस्म की मैना है।

“विरल किस्म की! मैंने अचरज के साथ पूछा।” 

“हाँ सर्, इस किस्म की मैना बात करने में इंसान को भी पीछे छोड़ देती है। इसे ज्यादा सिखाने की जरूरत नहीं है। यह सुन – सुन कर सब कुछ सीख जाती है।”

“फिर तो बड़ी अच्छी बात है। मेरा बेटा अभी दो महीने का हुआ है। यह एक और सदस्य जुड़ जाएगा परिवार के साथ। दोनों एक साथ बोलना शुरू करेंगे।” 

घर पहुँच कर पत्नी से इस नन्ही मैना की विशेषता बतायी। खुश होकर उन्होंने एक अच्छे पिंजरे का इंतजाम किया।

बेटा पालने में झूल रहा था और पिंजरे में मैना। बेटा हाथ – पैर हिलाते हुए खिलौने की ओर देख कर हाऊँ – हाऊ@ं हो रहा था। मैना पिंजरे में नीचे ऊपर होते हुए चहचहा रही थी। बेटा पेट के बल रेंगने लगा। मैना पंखों को हिला रही थी पिंजरे में।

बेटा घुटनों के बल चलने लगा, मैना तुतलाने लगी। जिस दिन मैना तुतलाने लगी, उस दिन हम खुश हो गये। लेकिन अगले ही पल हमारी खुशी गायब हो गयी, जब हमने सोचा कि आठ-नौ महीने की नन्ही मैना यदि बोलना सीख रही है, तो हमारा बेटा एकाध शब्द तो बोलता। किन्तु इस बीच हाऊँ – हाऊँ के अलावा कुछ और सीखा तो नहीं है।

मन को समझाया। काफी बच्चे देर से बात करते हैं, इसकी कई नजीर हैं। हो सकता है कि बेटा देर से बात करे। एक साल हो गया, बेटे का वही हाल है। डेढ़ साल हो गये, फिर भी मुँह नहीं खुला। लेकिन मैना अभी बेरोक-टोक बोल रही थी। पिताजी और माँ से लेकर प्यून और नौकर तक के नाम उसके मुँह में थे। टी.वी. के विज्ञापनों को भी सुन-सुन कर धीरे – धीरे बोलना शुरू कर दिया था। दरवाजे की घण्टी बजते ही पुकारती थी कि माँ! देखिए, कोई बुला रहे हैं। बेटा रोता तो बोल उठती कि माँ! बाबू रो रहे हैं। अथवा बेटा मिट्टी – कंकड़ मुँह में डालता तो मैना बोल उठती कि बाबू मैला हो रहे हैं। मैना की बातें सुन – सुन कर हम बेटे के लिए चिंतित हो उठते। उसमें यदि कोई कमी नहीं है, तो इतने दिन हो गये बोल क्यों नहीं पा रहा है? डेढ़ साल का हो चुका है। सिर्फ भयंकर हाऊँ – हाऊँ की आवाज के अलावा उसके मुँह से कोई और शब्द निकलता क्यों नहीं है?

बेटे को लेकर डॉक्टर के पास पहुँचे। जाँच – परख करने के बाद उन्होंने कहा कि बेटे की बनावट में कोई कमी नहीं है। कुछ बच्चे काफी देर से बोलते हैं। इसका भी वैसा ही हो सकता है। इसलिए धीरज के साथ प्रतीक्षा कीजिए। लेकिन इसके साथ ज्यादा से ज्यादा बातचीत करने की कोशिश कीजिए।

दो साल पूरे हो गये, पर बेटे के मुँह से बात नहीं निकली। बल्कि उसकी “हाऊँ – हाऊँ” धीरे – धीरे तीखी होती गयी। हमें लगा कि बेटा गूँगा हो जाएगा। अब की बार एक बड़े डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने सारी जाँच – परख के बाद कहा कि आपके बेटे की स्वर-पेटिका की बनावट में काई कमी नहीं है। समस्या वास्तव में स्नायुगत है। अच्छा होगा यदि आप इसके लिए किसी स्नायु – विशेषज्ञ से सलाह – मशविरा करें। इस दिशा में हमें सहायता पहुँचाने के लिए हमें एक स्नायु – विशेषज्ञ का पता भी दिया।

उनके पास पहुँचने के बाद फिर नये सिरे से एक बार जाँच – परख शुरू हुई। कुछ नई जाँच के साथ हेड-स्कैनिंग भी की गई। सारी जाँच खत्म होने के बाद डॉक्टर ने कहा – “स्पीच माड्युलेशन के लिए ब्रेन से जो नस निर्देश देती है, वह निक्रिय हो गयी है। उसका ऑपरेशन करके सक्रिय किया जा सकता हैं। किन्तु उसमें एक दिक्कत है।”  

“कैसी दिक्कत?”

“यदि ऑपरेशन सफल नहीं हुआ, तब फायदे के बदले नुकसान ज्यादा होगा। आप लोग यदि इस रिस्क के लिए तैयार हैं, तो मैं ऑपरेशन कर सकता हूँ। लेकिन अब नहीं। इसकी उम्र बढ़ने के बाद।”

“किस उम्र में ?”

“बच्चे को पाँच साल होने दीजिए। फिर भी इस बीच आप लोग कोशिश करते रहिए। किसी चमत्कार के कारण यदि वह बोलना शुरू कर देता है, तो अच्छी बात है।”

हमें पता था कि हमारे मन को तसल्ली दिलाने के लिए डॉक्टर ऐसा कह रह थे। इसका विश्वास यद्यपि हमें नहीं था कि कोई चमत्कार होगा, फिर भी मन को समझा-बुझा कर हम लौटे। लौटने के बाद मेरी पत्नी पूरी तरह ईश्वर के भरोसे रह कर अनेक धर्म-कार्य में मन लगाने लगी। घर में अखण्ड गीता, भागवत, चण्डीपाठ के साथ – साथ अन्यान्य मंत्रों का जाप चलता रहा। घर में पूजा – पाठ और होम – यज्ञ करते समय हमें बार – बार यह याद हो आता था कि यह पूजा किसी महत् लक्ष्य या मोक्ष – प्राप्ति के लिए अभिप्रेत नहीं है। यह सिर्फ बेटा बोले सके इसके लिए है।

हमारे मंत्र -जाप और पूजा का प्रादुर्भाव जब अधिक बढ़ता, तब शिशु – पुत्र अपने स्वभाव सुलभ “हाऊँ-हाऊँ” शब्द को और ज्यादा बढ़ाता। वह पूजा-पाठ में खुद को शामिल करके पास ही बैठा रहता। फल-स्वरूप मेरी पत्नी के मन में धीरे-धीरे एक विश्वास उत्पन्न हो रहा था कि एक – न- एक दिन वह बोल उठेगा और पुकारेगा माँ – माँ।

काफी दिनों से चल रहे हमारे पूजा – पाठ से भी वैसा कुछ चमत्कार हो नहीं रहा था। लेकिन हमारे अनजाने में एक और चमत्कार हो रहा था, जिसकी ओर हम में से कसी ने ध्यान नहीं दिया था। विष्णु सहस्त्र नाम से लेकर गीता, भागवत और विभिन्न मंत्र जिनका जाप हमारे घर पर इन कुछ वर्षों से हो रहा था, उन्हें मैना ने प्राय: रट लिया था। हमारे रोजमर्रे के काम के लिए जब मंत्र-पाठ बन्द हो जाता था, वह शुरू कर देता था अपना  मंत्र – पाठ। संस्कृत शब्दों का इतना शुद्ध उच्चारण, वह भी एक सामान्य पक्षी के मुँह से सुनकर हम आश्चर्य – चकित हो उठते थे। मैं तो मन-ही-मन सोचता था कि उस फॉरिस्टर ने सच ही कहा था कि यह एक विचित्र और विरल पक्षी है।

पौ फटने से पहले मैना आवाज लगाती – मुन्ना उठो, सुबह हुई। उसकी आवाज सुनकर बेटा धीरे – से उठ बैठता और पहुँच जाता पिंजरे के पास। मैना कहती बोलो ओ।़म्। बेटा बार – बार कोशिश करता। लेकिन हमेशा की तरह वही एक ही शब्द उसके मुँह से निकलता “हाऊँ-हाऊँ” । बेटा उसके पिंजरे का द्वार खोल देता। वह आकर उसके कंधे पर बैठ कर कहती, बोलो ओ।़म्। वह ओ।़म्, ओ।़म् बोलती रहती, लेकिन बेटा अपनी जीभ को उलथा नहीं कर पाता। वह सिर्फ मैना को बड़ी आत्मीयता से प्यार करता रहता। उसकी बोलने वाली चोंच को अचरज के साथ निहारता रहता।

बेटा यद्यपि बात नहीं कर पा रहा था, तथापि दूसरे सामान्य बच्चों की तरह उसमें हठीलापन था। खाना खाते समय वह सबसे ज्यादा हठीला हो जाता था। लेकिन मैना को पास बिठा कर खिलाने से उसका हठीलापन कम हो जाता था। मैना के पास कुछ भीगे हुए चने, मटर की फली या कोई एक फल रख देने से वह उसे खाने लगती। उसको खाते हुए देख बिना हठ किये वह भी खाना खा लेता था।

बेटा बात नहीं कर पा रहा था। इसलिए भाई – बंधु और सगे – सम्बन्धियों के मन में दु:ख था। इसलिए ऐसे लोगों का आना – जाना हमेशा हमारे घर में लगा रहता था। बेटे के लिए हमें ढाड़स बँधाने के फौरन बाद वे मैना की बातें सुनना चाहते। उसकी बातें सुनकर वे इतना आश्चर्य-चकित और तल्लीन हो जाते कि लौटने तक सिर्फ मैना के बोलने की सामर्थ्य की तारीफ करते रहते। मैना की बातें सुनने के बाद उनके चेहरे पर जो उल्लास का भाव उभर उठता, उसमें कहीं खो जाता उनके आने का असली उद्देश्य। उनके लौटने के बाद मेरी स्त्राrr और ज्यादा उदास हो उठतीं। गुस्से में आग बबूला होकर सवाल करतीं – “क्यों आये थे ये लोग। बेटे के गूँगेपन के कारण ढाड़स बँधाने के लिए या मैना की बातें सुनने के लिए?” 

धीरे – धीरे इस छोटे – से शहर में मैना एक  चर्चा का विषय बन गयी थी। मेरे परिचय के साथ भी जुड़ गया था मैना वाले रेंजर। मैं जहाँ कहीं भी जाता, किसी न किसी तरीके से मैना की बात छिड़ ही जाती। मैंने उसे कहाँ से खरीदा, कितने रुपये में खरीदा और इस किस्म की मैना कहाँ मिल सकती है आदि … आदि। कुछ लोग तो कहते कि सुना था कि मैना बोलती है और देखा भी था। लेकिन वह सब मामूली दो-चार शब्द ö राम – राम, चक्रधर, पक्षी-जन्म से पार कर। बहुत ज्यादा हुआ तो पालने वाले पे बच्चों का नाम लेकर पुकारना आदि। लेकिन यह तो अद्भुत मैना है। विष्णु सहस्त्रनाम से लेकर गीता, भागवत तक सब कुछ जुबान पर। आपने उसे यह सब सिखाया या वह अपने आप सीख गयी?

– अपने आप।

– अपने आप! यह तो निश्चय ही शुकमुनि को दिव्य ज्ञान देने वाली मैना का वंशधर रही होगी। कुछ भी हो, यह आपका सौभाग्य है, जो आपको एक ऐसी मैना मिल गयी।

इधर बेटे की वाक्हीनता थी और उधर मैना की वाक्पटुता। उसकी तारीफ सुनते – सुनते उसके प्रति मेरे मन में विद्वेष उपजने लगा था और मेरी पत्नी के मन में ईर्ष्या। कभी- कभी मैना की माँ-माँ की पुकार से खीझते हुए वे चिल्ला उठतीं – “बन्द कर, बन्द कर यह पुकार। जिसके मुँह से माँ की पुकार सुनना चाहिए, उससे तो सुन नहीं पा रही हूँ, और यह पुकार रही है माँ – माँ! मैंने क्या अण्डा सेकर तुझे पैदा किया था?”

मैं उनके गुस्से के कारण को समझता था। इसलिए उन्हें समज्ञाता कि उस पर बेवजह गुस्सा उतारने से क्या फायदा। यही सोच लो कि यह हमारी बदकिस्मती है।

मेरी पत्नी अपना गुस्सा थूकने के बदले कहती कि मुझे तो लगता है कि मेरे बेटे के गूँगे होने की जिम्मेदारी इस मैना की है। यह जरूर कोई मायावी मैना है। इसने मेरे बेटे की बोलने की शक्ति को चुरा लिया है। वरना एक मैना होकर इतने सारे मंत्र और श्लोकों  को किस तरह बेधड़क गाती चली जाती है।

मैंने गंभीरता के साथ सोचा कि यह बात सच भी हो सकती है। भगवान एक तरफ बिना माँगे कुछ देते हैं, तो दूसरी तरफ कुछ ले भी लेते हैं। पर मन की बात मन में ही रख कर चुप रहा।

बेटा जितना बड़ा होता जाता था, उसके शब्दों के स्फुरण में भाव की विकलता और स्वर की वीभत्सता उतनी ही अधिक होती जाती थी। उसके मनोभाव की सारी अभिव्यक्ति एक ही शब्द में सीमित रहती थी ö हाऊँ – हाऊँ। अपने मनोभाव को व्यक्ति न कर पाने के कारण वह जितना दु:खी हो रहा था, उससे ज्यादा दु:खी हम हो रहे थे। हमेशा एक ही चिन्ता हमें सताती थी कि और थोड़े दिनों के बाद वह पूरा पाँच साल का हो जाएगा। अब ऑपरेशन करने का समय आ चुका है। हम ऑपरेशन की बात सोचते ही ज्यादा चिंतित हो उठते थे। क्योंकि यदि अॅापरेशन सफल नहीं हुआ, तो क्या होगा? डॉक्टर ने यही कहा था न कि फायदे की तुलना में नुकसान ज्यादा होगा। कैसा नुकसान हो सकता है वह? बेटे की जान पर आफत आ सकती है क्या? यदि जान की आफत है तो, वैसे ऑपरेशॅन से क्या फायदा? बोल सके या न बोल सके, जीवित तो रहे। प़ढ़ाई-लिखाई नहीं कर सकेगा, न सही? इतनी सारी दौलत है, क्या गुजारा कर नहीं पाएगा?

हम पति-पत्नी दोनों ने सोचा कि ऑपरेशॅन के खतरे को जानते हुए यदि हम ऑपरेशॅन कराते हैं, फिर ऑपरेशॅन के बाद यदि कुछ हो जाता है, तो हम खुद को माफ कर पायेंगे क्या? नहीं। इसलिए तय किया कि वह ऐसा ही रहे। बात नहीं कर सका, तो न सही।

मंत्र और तंत्र के साथ – साथ मेरी पत्नी अब ज्यादा सहारा ले रही थी साधु, संत और संन्यासियों का। उन्हें कहीं से खबर मिली कि एक सिद्ध – संन्यासी ऋषिकेश की एक गुफा में रहते हैं। उनके हाथ के स्पर्श से सभी रोग, शोक और दु:ख दूर हो जाते हैं। उन्होंने मुझे उनके पास चलने के लिए बाध्य किया। बेटे को साथ लेकर बड़ी कठिनाई से हम उनके पास पहुँचे। जब हम पहुँचे, उस समय वे ध्यानस्थ थे। हमें सारा दिन और सारी रात इंतजार करना पड़ा। उनके एक शिष्य ने हमें कहा ö “कल सुबह बाबा के ध्यान टूटने के बाद पहले वे गंगा नदी की ओर जाएँगे। वहाँ से स्नान करके जब वे लौट रहे होंगे, वही समय ही अपनी समस्या को उपस्थापित करने का सब से सही समय है। आप लोग कल सुबह उनका अनुसरण कीजिए। लेकिन  एक बात याद रखिए, वे जब तक कुछ पूछते नहीं हैं, तब तक उनसे बातचीत करने की कोशिश मत कीजिए।” 

अगले दिन सुबह बाबा का ध्यान टूटा। वे ध्यानस्थ – मुद्रा से उठ कर सीधा चले गंगा किनारे। एक नियत दूरी कायम करते हुए हम ने उनका अनुसरण किया। बाबा स्नान – तर्पण से निवृत होकर आश्रम की ओर लौटने लगे। हम फिर उनके पीछे – पीछे चलने लगे। हमारी उपस्थिति से वे अवगत हो चुके थे। अचानक एक वृक्ष के नीचे वे खड़े हो गये। अपने कमण्डलु से थोड़ा-सा जल वृक्ष की जड़ में डाल कर उसके उद्देश्य में कहा ö “शब्दमय विश्व में स्वयं को व्यक्त करने के लिए तुम शब्दों का सहारा ले रहे हो क्या?” 

हम सिर्फ आश्चर्य – चकित हो उनकी बातें सुन रहे थे। पल भर के बाद उन्होंने अपनी यात्रा शुरू की। इस रहस्य के उत्तर को पूछने का साहस न जुटा पाकर हम सिर्फ उनके पीछे – पीछे चल रहे थे। बिना ठहरे ही वे हमारे उद्देश्य में कहने लगे – “अनुसरण का कोई मूल्य नहीं है। अनुध्यान करो। ब्रह्म ही शब्द है। ब्रह्म को बिना पहचाने शब्द के लिए यह व्याकुलता क्यों?”

उनकी आवाज में न जाने कैसी शक्ति थी कि उनका अनुसरण करने के लिए हम हिम्मत नहीं जुटा सके।

घर लौटने के बाद मैंने सोचा कि इस धरती पर करोड़ों प्रकार के जीव हैं। इंसान को छोड़ कर कोई और प्राणी बोल नहीं पाता है। किसी और के बोल न पाने के कारण धरती अटक ते नहीं गयी है। इसकी मधुरिमा घट तो नहीं रही है। भावों का आदान-प्रदान न बाधित हो रहा है और न बाधित हो रही है धरती की भावमयता। प्रकृति में निहित नि:शब्द का आवेदन जितना गहरा है, यदि पेड़ -पौधे, वन – पहाड़, नद- नदी, जीव-जन्तु सभी बात कर रहे होते तो क्या धरती की शान्त, स्निग्ध और पवित्र नीरवता कायम रह पाती? मनुष्य के अलावा ईश्वर ने सर्वत्र शब्द दिये हैं, पर किसी को मुखर नहीं बनाया है। इसलिए तो मानव मानसिक शान्ति पाने के लिए खोजता है नीरवता को, खोजता है प्रकृति की गोद को। याद  आयीं उस वृक्ष को निमित्त बना कर हमारे उद्देश्य में संन्यासी की कही हुई बातेंö “शब्दमय विश्य में स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए तुम शब्दों का सहारा ले रहे हो क्या?” धीरे – धीरे संन्यासी की बातों का रहस्य उन्मोचित हा रहा था। मुझे लगा कि मैं इतने दिनों तक बेटे के गूँगेपन को लिए बेकार में भटक रहा था। मुझे उसके होठों के शब्दों को नहीं, बल्कि उसके चेहरे के भाव को पहचानना था।

आश्रम से लौटने के बाद मेरी पत्नी के मनोभाव में भी काफी परिवर्तन हो आया था। लग रहा था कि उन्हें अपनी समस्या का समाधान मिल गया हो। पहले की तरह मैना के प्रति उनका असूया – भाव दिखायी नहीं पड़ रहा था। बल्कि मैना की वे ज्यादा हिफाजत करने लगी थीं। घर का काम करते समय खुद मैना से कहतीं ö भागवत या विष्णु सहस्रनाम गाओ। संध्या – आरती के समय बेटे को पास बैठा कर मैना से कहतीं कि गाओ  – “जय जगदीश हरे।”

एक दिन सुबह घर के आँगन में लगे नल के पास मैना के पिंजरे को साफ कर उसे नहला दिया। बेटा भी इस काम में उन्हें सहायता पहुँचा रहा था। नहलाने के कारण पानी लगने से मैना पूरी तरह सिमट- सिकुड़ गयी थी। उसके पंखों को पोंछने के लिए वे एक सूखा कपड़ा लेने घर के अन्दर गयीं। उस समय न जाने एक काला कटास कहाँ था, लुकते-छिपते हुए आकर मैना पर झपट्टा मारने को हुआ। बेटा हाऊँ-हाऊँ करते हुए चीखने लगा। उसकी आवाज से पीछे नहीं हट रहा था वह कटास। एक सोंटा लिए उसके सामने खड़े होकर जोर-जोर से हाऊँ – हाऊँ कर रहा था बेटा। लेकिन वह बिना हटे मौके के इंतजार में था। मौका मिलते ही जैसे ही उसने मैना के ऊपर झपट्टा मारा, मैना को अपनी गोद में छिपाते हुए बेटा चीखने लगा – माँ, माँ, माँआ…।

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