short motivational story in hindi

वामन वृक्ष (short motivational story in hindi)

चलिए आज एक बहत ही दिलचस्प short motivational story in hindi में पढ़ते हैं । जिसके द्वारा हमें अद्भुत मोटवैशन मिले।

प्रदर्शनी मैदान में विभिन्न विभागों की तरफ से बनाये गये एक – एक स्टॉल को मैं घूमते हुए देख रहा था। उद्यान विभाग के स्टॉल के निकट मेरी नजर अटक गयी। वहाँ सजाये गये भिन्न-भिन्न किस्म के फूलों के गमलों ने मुझे जितना आकर्षित किया था, उससे ज्यादा आकर्षित किया था वामनीकरण किये गये विभिन्न वृक्षों के समूह ने। एक फुट या डेढ़ फुट ऊँचे पेड़ों पर गाढ़े हरे रंग के नींबू, संतरा और अमरूद लदे हुए थे। उन सब को देखते समय मैं चौंक उठा जब मेरी नजर एक वामन बरगद के पेड़ पर पड़ी। वह पेड़ पूर्ण वयस्क-सा लग रहा था। नीचे की ओर पसर आयी थीं गाँठदार धागों जैसी जटाएँ। पेड़ का तना गठीला और गाँठदार होने के साथ-साथ शाखा और प्रशाखाएँ एक पूर्ण वयस्क-सी लगी रही थीं। यद्यपि वह पेड़ वामन जैसा था, पर उसके पत्ते और फल किसी स्वाभाविक पूर्ण विकसित पेड़ जैसे ही थे। पेड़ को देखते ही मैं उसकी ओर विशेष रूप से आग्रही हो उठा। गमले के पास खड़े होकर काफी देर तक उसका निरीक्षण करने के बाद मुझे लगा कि इस पेड़ के पूर्ण विकसित रूप को मैंने कहीं न कहीं देखा है। फिर भी ठीक से याद नहीं आ रहा था कि उस पेड़ को मैंने कहाँ देखा है। लग रहा था मानो वह पेड़ मेरे अवचेतन मन में सहेज कर रखे हुए किसी विराट वृक्ष का फोटोग्राफ जैसा हो।

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उस पेड़ को खरीदने का इरादा लेकर स्टॉल की जिम्मेदारी सँभालने वाले एक कर्मचारी से पूछाö “इसकी कीमत क्या है?”
कर्मचारी ने कहा किö “यह बेचे जाने के लिए नहीं है। सिर्फ प्रदर्शन के लिए है।”
यह बिकाऊ नहीं है जानने के बाद मुझे लगा जैसे किसी इप्सित वस्तु की प्राप्ति के सौभाग्य से मुझे वंचित होना पड़ रहा है।
“यह पेड़ आपके विभाग के द्बरा ही बनाया गया है न?”
“नहीं – हमारे विभाग के द्वारा नहीं, हमारे डेप्यूटि डाइरेक्टर ने अपने वैयक्तिक शौक के कारण इन प़ेड़ों को बनाया है। इस प्रदर्शनी में अपने स्टॉल को आकर्षक बनाने के लिए उनसे इन पेड़ों को लाकर रखा गया है। “
“इस तरह का एक पेड़ खरीदना चाहें तो कीमत क्या होगी?”
“बनसाइ की किमत तय होती है उसकी उम्र को लेकर।”
“इस पेड़ की उम्र क्या होगी?”
“सही पता तो है नहीं, फिर भी पच्चीस – तीस साल जरूर होगी। इस तरह के एक बनसाइ पेड़ की कीमत एक हजार रुपये से ज्यादा जरूर होगी।”
उस पेड़ के प्रति मैं इतना आकर्षित हो उठा कि मैं अपने आवेग को सँभाल नहीं सका और कह उठाö “उससे भी ज्यादा रुपये दूँ, तो क्या आपके डेप्यूटि डाइरेक्ट उस पेड़ को नहीं बेचेंगे?”
“मुझे ऐसा नहीं लगता कि वे पैसों के लिए इस पेड़ को बेच देंगे। पर आपका आग्रह यदि इतना ज्यादा है, तो एक बार उनसे बात कर लीजिए। वे एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो किसी का आग्रह तोड़ नहीं सकते।”
उस आदमी की इस बात को सुनते ही मुझ में एक आत्मविश्वास जागा कि मैं डेप्यूटि डाइरेक्टर साहब को किसी तरह राजी करके उस पेड़ को ले पाऊँगा।
अगले दिन उनके दफ्तर में पहुँचा। उनसे कुछ देर तक बातचीत करने के बाद उन्हें बनसाइ पेड़ को बनाने के तरीके के बारे में पूछा। बनसाइ पेड़ के बारे में मेरे आग्रह को देख, उन्होंने अपने रैक से एक किताब निकाली, किताब को मेरी ओर बढ़ाते हुए कहाö “अब इस कला में काफी प्रगति हो चुकी है। इस पर काफी किताबें लिखी गयीं हैं। आप इस किताब को पढेंगे तो आपको इस कला की एक स्थूल धारणा हो जाएगी।”
मैं भले ही किताब का एक – एक पन्ना पलटता जा रहा था, पर मन ही मन सोच रहा था कि उस बनसाइ पेड़ के बारे में कैसे पूछूँ। किताब के पन्नों को पलटने के मेरे उस आग्रह को देख उन्होंने कहा – “सिर्फ सरसरी निगाह से किताब को देखने से कुछ नहीं होगा। यदि इस कला में आपकी रुचि है, तो पढ़ने के लिए आप इस किताब को ले जा सकते हैं।”
“मैंने सुना है कि इस विषय में आपकी काफी रुचि है और ज्ञान भी?”
“ज्ञान के बारे में तो कह नहीं सकता, पर रुचि है। रुचि है, यानी रुचि थी।”
“थी यानी अब रुचि नहीं है?”
“अब करीब नहीं है कहें तो गलत नहीं होगा।”
“क्यों?”
“कुछ वैयक्तिक कारणों से अब मैंने उस कला से दूरी बना रखी है।”
“उन कारणों के बारे में क्या मैं कुछ जान सकता हूँ।”
“वैयक्तिक कारण कह चुकने के बाद, उस बारे में पूछना अब ठीक नहीं है।”
“ओह – सॉरि! प्रदर्शनी में आपके उस बनसाइ बरगद के पेड़ को देखने के बाद उस पेड़ के प्रति मेरा आग्रह इतना बढ़ गया कि मैं आपसे मिलने चला आया।”
“तो वह पेड़ आपको अच्छा लगा?”
“सिर्फ अच्छा नहीं लगा – यदि आप राजी होंगे, तो मैं उसकी सही कीमत देकर…”
“तो आप उस पेड़ को खरीदना चाहते हैं?”
“यह सच है कि चाहता हूँ, लेकिन इसमें यदि, आपको कोई आपत्ति है, तो मुझे दु:ख नहीं होगा।”
कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहने के बाद उन्होंने कहा – “मैं फौरन आपको कोई वचन दे नहीं पा रहा हूँ। पर आप कल दोपहर को आइये, मैं अपनी राय बता दूँगा।”
उसके अगले दिन दोपहर तक का इंतजार शायद मेरी जिन्दगी का सब से लम्बा इंतजार था। मैं मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि वे जैसे भी हो उन्हें राजी करके उस पेड़ को मुझे दिलाने का इंतजाम करें।
दोपहर को उनके आफिस में पहुँचते ही उन्होंने मेरी ओर एक पर्ची बढ़ा दी। कहाö “प्रदर्शनी के बाद इस पर्ची को दिखाकर वहाँ से उस पेड़ को ले जाइये।”
मैं उस पर्ची को एक परम प्राप्ति के अनुभव की तरह लेकर इस बात का इंतजार करता रहा कि वे पेड़ की कीमत के बारे में क्या कहेंगे। मेरे मन के भाव का सही आकलन करते हुए उन्होंने कहा – “इन सब चीजों की कीमत नहीं लगायी जाती। लेकिन आपके आग्रह को देखते हुए मेरी तरफ से यह आपके लिए उपहार है।”
प्रदर्शनी के बाद उस पेड़ को लेकर जब मैं घर लौट रहा था, तब मेरे भीतर एक पुलकित अनुभव था। मुझे संदेह है कि द्रौपदी को स्वयंवर में जीत कर लौट रहे पाण्डवों को ऐसा अनुभव हुआ होगा या नहीं। पॉर्टिको के नीचे पेड़ को रख कर माँ और पत्नी को बुलाकर सॅप्राइज देने के लिए घर के अन्दर गया।
उन्हें बाहर बुलाकर कहा – “तुम लोग खुद बताओ कि पॉर्टिको के नीचे कुछ फर्क महसूस कर पा रहे हो।”
माँ की नजरों ने फौरन फर्क को तलाश लिया। उसने कहाö “अरे, इस वामन बरगद को कहाँ से ले आया?”
“प्रदर्शनी से।”
“क्या घर के बगीचे में लगाएगा?”
“लगाऊँगा क्या – यह पेड़ इस गमले में रहेगा।”
“गमले में बरगद, फिर घर के बगीचे में”
“इससे क्या होता है?”
“तुझे यह दिमाग कहाँ से मिला? आँगन में बरगद का पेड़ बिलकुल शुभ नहीं है। सड़क के किनारे बरगद का पेड़ लगाएँ तो शुभ और धर्म है। पथिक को छाँह मिलेगी और चिड़िया – चुनमुन नीड़ बनायेंगे। लेकिन यह तो एक बौना बरगद का पेड़ है। ना छाँह दे सकता है, ना इसकी डालों में कोई नीड़ बना सकता है?”
“तेरा तो अजीब दिमाग है। समझे, यह है बनसाइ पेड़। पॉर्टिको या ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने के लिए इस पेड़ को बनाया गया है, छाँह पाने या चिड़िया – चुनमुन के नीड़ बनाने के लिए नहीं।” अपनी बात के समर्थन के लिए मैं पत्नी की ओर देखने लगा।
वह शायद हम माँ – बेटे के झमेले में पड़ना चाहती नहीं थी। सिर्फ कहा – “यह पेड़ काफी खूबसूरत लग रहा है। लगता है कि जरूर एक पूर्ण वयस्क बनसाइ है!”
माँ को पता लग गया कि उसकी राय का कोई महत्व रहेगा नहीं। सिर्फ कहाö “बनसाइ या फनसाइ मैं तो नहीं जानती, पर मैं इतना जानती हूँ कि घर के आँगन में बरगद का पेड़ शुभ फल देने वाला नहीं है। अब जमाना बदल गया है। कई जरीब जमीन में फैलने वाला बरगद अब गमले में भी आ सकता है। ठीक है, तुम्हें जो अच्छा लगे वही करो।”
मुझे पता था कि माँ यहाँ ज्यादा दिन रुकने वाली नहीं है। स्मिता कि मॉर्निंग सिक्निस होने के कारण वह यहाँ आयी हुई है। उनकी स्थिति स्वाभाविक हो जाएगी, तो माँ गाँव लौट जाएगी। फिर आयेगी डिलिवॅरि के समय।
बरगद को ड्रॉइंग रूम में रखने की बात तय करके उसकी इंटिअॅरिअर डेकॅरेशॅन को हमें पूरी तरह बदलना पड़ा। एक कोने में टी.वी. को रखा गया और दूसरे कोने में पेड़ को, जिस तरह टी.वी देखते समय पेड़ भी दिखाई पड़ेगा। कोई अतिथि आये तो उनकी नजर पेड़ पर भी पड़ेगी।
उसी रोज रात को जब मैं बैठ कर समाचार देख रहा था, उस कालीन पर बैठ कर पान लगाते हुए माँ ने कहा – “इस पेड़ को देखते ही मुझे तुम्हारे गाँव के खेत में बारह जरीब वाली क्यारी की मेंड पर फैले हुए बरगद के पेड़ का खयाल आता है।”
मैंने फट से माँ की बात को सुनते ही कहा – “किस बरगद की बात तू कह रही है?”
“बारह जरीब वाली क्यारी के उस बरगद की बात, जहाँ भुवन नाई फाँसी लगा कर मरा था। तू ने तो बहुत दिनों से गाँव छोड़ दिया है, तुझे थोड़े ही उस प़ेड़ की बात याद होगी। “
“सही बात है। प्रदर्शनी मैदान में इस पेड़ को देखने के बाद मैं मन ही मन सोचता रहा कि ऐसे ही एक पेड़ का बड़ा रूप मैंने कहीं न कहीं देखा है। लेकिन याद नहीं कर पा रहा था। बचपन में पिताजी के लिए खाना लेकर जब मैं खेत में जाता था, तब उसकी जटाओं में और डालों में कितनी बार झूलता रहा। फिर भी देखो तो मैं याद नहीं कर पा रहा था। इस तरह के एक पेड़ का बड़ा रूप मैंने देखा था, इसलिए तो इसे लाने का आकर्षण मुझ में जगा।”
माँ ने कुतूहल के साथ पूछाö “इस पेड़ को किस तरह इतना छोटा बनाया जाता है? इस पेड़ की जटाओं और फलों को देखने से लगता है कि इसकी उम्र काफी हो चुकी है।”
“माँ यह सब चमत्कार विज्ञान और मानव का है!”
“अरे, विज्ञान को तो अच्छा काम करना चाहिए। इस तरह के बेमतलब के काम में विज्ञान सिर क्यों खपा रहा है। यदि अपने शौक के लिए पेड़ को वामन बना लेते हैं, तो फिर खेलने के लिए खिलौना न खरीद कर किसी दिन मानव को भी वामन बना कर खिलौने की तरह खेलेंगे।”
माँ और मेरे बीच चल रही बातचीत को स्मिता सुन रही थीं। उन्होंने माँ के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा – “प्रकृति पर मानव का यह एक किस्म का अत्याचार है। बढ़ने की चाह रखने वाले एक पेड़ की जड़ को बार-बार काटते हुए उसे सिर्फ जीने लायक खुराक देकर बढ़ने का मौका न देना निश्चित रूप से अन्याय है।”
“रहने दो, रहने दो तुम्हारे ये दार्शनिक विचार। एक नन्हें में सौंदर्य की झलक को न देख कर तुम सब बेकार की बातों में सिर खपाते हो।”
अगले दिन सुबह जब मैं जागा, उस समय माँ नहा – धोकर ठाकुर जी की पूजा समाप्त करके बरगद की जड़ में मंत्रोच्चारण के साथ पानी डाल रही थी। मैंने चीखते हुए कहाö “यह तू क्या कर रही है माँ? उस पेड़ में पानी देने का हिसाब है और समय भी। तू यदि इस तरह नहाने के बाद पानी डालती रहेगी, तब तो यह धीरे – धीरे हमारे गाँव का विशाल बरगद जैसा हो जाएगा। फिर यह न गमले में रह पायेगा, न ड्रॉइंग रूम में।”
माँ ने – चुपचाप पानी डालने का काम खत्म करने के बाद कहाö “बरगद या पीपल का पेड़ घर में रहे तो उसे नहाने के बाद तनिक जल – दान करना विधि हैं। तुम्हारा विज्ञान कहता है न कि पेड़ का भी जीवन है।”
अब सुबह – सुबह माँ से बहस करना मैंने उचित नहीं माना और चुप रहा।
स्मिता की मार्निंग सिकनिस चले जाने के बाद वह धीरे – धीरे स्वस्थ हो रही थीं। उनकी सेहत ठीक होते देख माँ ने कहा – “मैं अब गाँव लौट जाऊँगी। वहाँ भी ढेर सारा काम पड़ा हुआ है। डिलिवॅरि से महीना भर पहले फिर आ जाऊँगी।”
माँ गाँव जाने के लिए गाड़ी में बैठते ही मुझे कहा – “उस पेड़ में थोड़ा-बहुत पानी देते रहना।”
खूब हल्के ढंग से ‘हाँ’ कहते हुए मैं सोच रहा था कि वह पेड़ किस तरह माँ के चेतना-राज्य पर हावी हो गया है।
एक बार रात को काफी देर तक मैं बैठे-बैठे टी.वी. देख रहा था। स्मिता बेड रूम में सो गयी थीं। गमले में लगे बरगद के पेड़ को मैं काफी देर तक एकटक निहारता रहा। मुझे लगा कि जैसे पेड़ में से एक आर्त निवेदन आ रहा है – “मुझे इस वामन जन्म से मुक्त कीजिए, मैं खूब प्यासा हूँ, मुझे पानी दीजिए। मेरे अन्दर निहित काया – विस्तार की विराट शक्ति को यों सीमित मत कीजिए।”
इसे अपना मानसिक भ्रम समझकर खुद को प्रकृतिस्थ किया। कुछ देर बाद मुझे फिर महसूस हुआ कि पेड़ अपनी काया का विस्तार कर रहा है। बढ़ते- बढ़ते वह तबदील हो गया है हमारे गाँव के विराट बरगद में। यह सोचकर कि वह पेड़ मुझ में भ्रांति भर रहा है, मैं टी.वी. बंद करके सोने के लिए चला गया। फिर कभी उस पेड़ को एकटक निहारने की कोशिश मैंने नहीं की है।
एक बार आधी रात को नींद से जागकर स्मिता ने मुझे जगाया – “अरे, उठो, उठो तो। मुझे खूब प्यास लग रही है।”
जाग कर मैंने कमरे की बत्ती जलायी। उनके लिए एक गिलास पानी ले आया। पानी पी चुकने के बाद उन्होंने कहा – “एक और गिलास।” पानी का दूसरा गिलास पी चुकने के बाद कहा – “मुझे ऐसा लगता है कि जितना भी पानी पी लूँ, मेरी प्यास बुझेगी नहीं। कैसा अजीब सपना मैंने देखा।”
“कैसा सपना देखा!”
“मैंने सपना देखा कि मेरे अन्दर पल रहा शिशु कह रहा है कि वह भूखा है और प्यासा है। उसे भोजन और जल चाहिए। भोजन और जल के अभाव से वह जूझ रहा है। अपनी भूख और प्यास को मिटाने के संघर्ष में सारी वसुधा को वह विदीर्ण कर डालना चाहता है। यह कैसा सपना है?”
“तुम ने आज रात को ढंग से खाना खाया था न? तुम्हें अब भूख-सी लग रही है क्या?”
“नहीं तो ।”
“मैं यह कह रहा था कि तुम अभी अकेली नहीं हो। तुम से भोजन लेकर एक और जीवन पल-बढ़ रहा है। खाते समय उसका भी खयाल रखना चाहिए।”
इसके बाद स्मिता हर रोज सुबह उठ कर अपने देखे हुए भिन्न – भिन्न सपनों का वर्णन करतीं। जिस दिन उनसे किसी सपने की बात नहीं सुनता, उस दिन मैं पूछता कि आज क्या सपने का कोई वृत्तांत नहीं है?
“वही एक ही किस्म का सपना – भूख और प्यास को ही रोज देखती हूँ। कब तक उन एक जैसे सपनों को तुम्हें बार – बार सुनाती रहूँगी। मैंने अब मान लिया है कि ये सब गार्भावस्था के लक्षण हैं।”
“गर्भावस्था के लक्षण तो हैं, लेकिन समयानुसार गर्भ के आकार को तो मैं कहीं देख नहीं पा रहा हूँ।”
“तुम्हें जो संदेह हो रहा है, मुझे भी वही संदेह हुआ। इसलिए मैंने उस दिन चेकअॅप के समय डॉक्टर से पूछा। उन्होंने कहा कि पहली प्रेगनॉन्सि में किसी-किसी का तो पता नहीं चलता कि गर्भावस्था भी है।”
धीरे – धीरे समय बीतता गया। माँ भी महीनों की गिनती करते हुए छोटे भाई को लेकर डिलिवॅरि के लिए गाँव से आ गयी। पहुँचते ही बड़े आश्चर्य के साथ स्मिता की ओर देखते हुए पूछा – “तेरा सब कुछ ठीक – ठाक तो है?”
“हाँ, सब कुछ ठीक है। नियमित चेकअॅप भी चल रहा है।”
“डॉक्टर ने तारीख कब की दी है?”
“डॉक्टर की तारीख के हिसाब से एक महीना करीब और है। लेकिन उससे पहले भी हो जाने की आशंका वे जता रही थीं।”
“हुँह पहले हो जाएगी। तुझे देखने से कोई कहेगा नहीं कि तेरे गर्भ को आठ महीने हो गये! वैसे गर्भ के आकार को कम करने के लिए कोई दवाई ले रही है क्या?”
“नहीं माँ! मैंने भी डॉक्टर से यह बात पूछी थी। उन्होंने कहा कि प्रथम गर्भ में कुछ लोगों का ऐसा होता है।”
“प्रथम गर्भ में ऐसा होता है – हम सबने क्या बच्चा पैदा नहीं किया है।”
“चेकअॅप से पता चलता है कि सब कुछ ठीक – ठाक है।”
“ठीक है। मैं भी ठाकुर जी से प्रार्थना करती हूँ कि सब कुछ ठीक – ठाक हो जाये।”
संभावित प्रसव की तारीख को अभी पन्द्रह दिन बाकी थे। एक रोज रात को अचानक स्मिता की प्रसव – वेदना शुरू हो गयी। हम फौरन अस्पताल ले गये। सारी रात पीड़ा होती रही। पौ फटने में तनिक देर थी कि डिलिवॅरि हो गयी। प्रथम पितृत्व के आनन्द से अधीर होकर लेबॅर रूम से आ रही एक नर्स से पूछा कि क्या हुआ है? विशेष खुशी प्रकट न करते हुए कहा की एक लड़का तो हुआ है, लेकिन यह पर्वत के चूहा प्रसव की तरह है। डॉक्टर जाँच कर रहे हैं। यदि प्रिमॅच्युर डिलिवॅरि के कारण इस तरह का छोटा शिशु पैदा हुआ है, तो उसे इनक्युबेटर में रखा जाएगा।
मेरे आग्रह में भाटा आ गया। मैं अनायास धीरे – धीरे लेबॅर रूम के पास पहुँचा। मुझे देखकर डॉक्टर ने हाथ के इशारे से अन्दर आने को कहा। जब मैं अन्दर पहुँचा, तो उन्होंने कहा ö मैं सन्देह कर रहा था कि हो सकता है कि प्रिमच्युर बॅर्थ के कारण ऐसा हुआ हो। इसलिए चेक अॅप कर रहा था। लेकिन यह प्रिमॅच्युर केस नहीं है। शिशु वामन बनकर पैदा हुआ है।
मेरे पास खड़ी हुई थी माँ। मुझे तनिक हिलाते हुए पूछा – “क्या हुआ है, क्या हुआ है?”
मैंने केवल तीन अक्षरों का उच्चारण किया – “वा-म-न”।

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